श्रीकृपा न्यास
आम्ही हिंदू हिंदू
आम्ही हिंदू हिंदू | दैवत अमूचे वंदू | दुसरे ते ना निंदू | शब्दे एका || १ ||
देव पत्थरा मानू | कोटिकोटि ही वानू | भाव, एकला भानू | उजळी सारे || २ ||
तो पत्थर जरि कां फुटे | भाव न तेथे घटे | दुसरा भावे नेटे | उभा करू की || ३ ||
जे दु:शासन – रावण | जे कंस जे दुर्योधन | सहकारी जे कर्ण | तयां निवारुं || ४ ||
ना वैरालागी वैरी | गुणवंता कैवारी | कृतज्ञता टि शिरी | वाहू आम्ही || ५ ||
एक पंचमी व्याळा | दुसरी वसंत काळा | एक पांडवा सबळा | गुणवंताते || ६ ||
आम्हा वैभव हवे | आम्ही घेऊं नवे | मूळ न सोडू कवे | धरिले जें का || ७ ||
प्राण आमुचा धर्म | न्याय नीतिचे कर्म | समतेचे जे वर्म | आम्ही जाणू || ८ ||
ललना रणरागिणी | सकल कलांच्या खाणी | वेदहि बोले वाणी | भर दरबारी || ९ ||
ही माती अमुची माता | निज माते परि नांदता | मग आम्हाही बंधुता | भलतेयाही || १० ||
आता टि ना वाटू | म्हणे तयानें दाटू | प्राणपणाने झगटू | जिंकू आम्ही || ११ ||
